कुख्यात तस्कर वीरप्पन को जब कर्नाटक और तमिल नाडू की फोर्स पकड़ नहीं पा रही थी तब दोनों राज्यों की सरकार ने मिलकर पचास करोड़ का इनाम घोषित किया।

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कुछ वर्षों बाद जब वीरप्पन का एनकाउंटर हुआ- वो मारा गया तब तक़रीबन ८५० लोगों ने सरकार के पास अर्जी भेजी कि उनकी तहरीर पे वीरप्पन मारा गया था- लिहाज़ा उन्हें इनाम दिया जायें। पोस्टमैन, पुलिस , धोबी, कुंजड़े, मज़दूर, कुत्ता , बिल्ली- सब ने अपना अपना क्लेम ठोका था।

सरकार कहाँ से पचास करोड़ देती- ख़ज़ाने में इतना रोकड़ कहाँ रहता था उस टाइम। और इनाम किसे देती?

तो ऐसी प्रजा की वैसी सरकार ने एक तरकीब निकाली- उन्होंने बीस लोगों को सेलेक्ट किया- सब को एक एक ख़त भेजा।

ख़त में लिखा – आपको वीरप्पन वाले पचास करोड़ हेतु चुना गया है। आपके साथ १९ लोग और चुने गए है- और आप बीस लोगों को एक दूसरे की पहचान नहीं है। यदि आपको इनाम चाहिए तो एक हफ़्ते में अपना प्रार्थना पत्र भेजें। लेकिन दो शर्त है।

पहली शर्त है कि यदि आपने अपना प्रार्थना पत्र नहीं भेजा तो आपको इनाम नहीं मिलेगा।

दूसरी शर्त है कि आपके अलावा यदि किसी और ने भी प्रार्थना पत्र भेजा तो घंटा किसी को इनाम नहीं मिलेगा।

स्वाभाविक सी बात है- सरकार को वापस पूरे २० पत्र मिले- और सरकार को किसी को कुछ नहीं देना पड़ा।

यथा प्रजा तथा राजा!

इस कांड पे कर्नाटक के सीएम ने हंसते हुए शेर पढ़ा-

काली चिमनी पे ये पोडर की सफेदी मल कर

बुते ऐयार तू धोखा ना दे परवाने को !

नोट- ये इनामी राशि एसटीएफ को मिलने वाली इनाम से अलग थी!

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